Tuesday, October 18, 2011

मनुष्य की पहचान

यह उस समय की बात है, जब कबीर दास की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैलने लगी थी। लोग बड़ी संख्या में उनसे मिलने आते थे। एक दिन जब वह कपड़ा बुन रहे थे, उनके पास कई सेठ आए और बोले, 'अब आप साधारण व्यक्ति नहीं रहे। जब साधारण व्यक्ति थे तब तो आपका कपड़ा बुनना ठीक था। पर अब आप की चर्चा संत के रूप में होती है। आप को फटे-पुराने कपड़े पहने हुए देख हमें शर्म महसूस होती है। फिर आप को अपने हाथ से कपड़ा बुनने की आवश्यकता ही क्या है। अब हम लोग आप की हर जरूरत को पूरा करेंगे। आप के लिए एक भव्य आश्रम बना देंगे।'

कबीर ने कहा, 'आप लोगों को देख कर मुझे शर्म आती है। पहले मैं अपने लिए कपड़ा बुनता था, मगर अब गरीब लोगों के लिए बुनता हूं। मेरी देखादेखी और लोग भी यह काम करेंगे। मनुष्य को अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए। आज आप उस समय हमारी मदद करने आए हैं जब मुझे आपकी सहायता की जरूरत नहीं है। आप उनकी सहायता करें जिन्हें आपकी जरूरत है। आप देखते होंगे कि काशी के घाट पर कितने लोग भूखे सोते है। उन्हें देख कर आप को शर्म महसूस नहीं होती होगी। क्योंकि आप हमारी मदद करने नहीं अपना प्रचार पाने के लिए यहां आए हैं।' यह सुन कर सभी सेठ शर्मिंदा हो गए और उन्होंने माफी मांगी। उन्होंने वचन दिया कि वे हर रोज काशी के घाट पर गरीबों को खाना खिलाएंगे। तब से शुरू हुई वह परंपरा काशी में आज भी जारी है।

ईर्ष्या की आग

दो विद्वान एक सेठ के घर भोजन के लिए आमंत्रित थे। ये दोनों विद्वान एक - दूसरे को देखना नहीं पसंद करते थे और मौका मिलते ही एक - दूसरे की बुराई करने लगते थे। दोनों नियत समय पर सेठ के घर पहुंचे और एक - दूसरे को देखकर मुंह बनाने लगे। सेठ ने दोनों से स्नान करने का निवेदन किया। जब एक विद्वान नहाने चला गया तो सेठजी दूसरे के पास आकर बैठ गए और बातें करने लगे।

वह बोले , ' महाराज , लगता है आपके ये साथी पहुंचे हुए विद्वान हैं। उन्हें काफी गूढ़ बातें मालूम है। ' दूसरा विद्वान भला यह कैसे सुन सकता था ? वह तपाक से बोला , ' अरे नहीं सेठजी , इसका तो विद्वता से दूर - दूर तक का कोई रिश्ता नहीं है। यह तो निरा बैल है। पता नहीं इसे लोग अपने यहां क्या सोचकर आमंत्रित कर लेते हैं। ' तभी उसका साथी नहाकर बाहर आता दिखाई दिया तो वह चुप हो गया। कुछ देर बाद वह स्वयं स्नान के लिए चला गया तो सेठजी पहले विद्वान से बातें करने लगे और दूसरे विद्वान के बारे में बोले , ' अभी मैं आपके साथी से ही बातें कर रहा था। मुझे तो वह वेदों के बहुत बड़े ज्ञाता लगे। ' सेठजी की बात पर वह विद्वान हंसते हुए बोला , ' क्या सेठजी , वह और विद्वान ! अरे विद्वान आपने देखे ही कहां हैं। वह तो निरा गधा है। ' अपने साथी के वापस आते ही वह भी चुप हो गया। कुछ देर बाद दोनों को भोजन के लिए बुलाया गया। दो थालियां रखी गईं , जिनमें से एक में घास और दूसरे में भूसा रखा था। दोनों विद्वान बिदक कर सेठजी से बोले , ' यह क्या !

आपने हमारा अपमान करने के लिए यहां बुलाया है ?' उनकी बातें सुनकर सेठजी बोले , ' महाराज ! आप दोनों ने ही तो एक - दूसरे को गधा और बैल बताया है। गधा और बैल ऐसी ही खुराक तो खाते हैं। अब इसमें मेरा क्या दोष ?' यह सुनकर दोनों शर्मिंदा हो गए। उन्होंने ईर्ष्या की आग अपने भीतर से निकाल दी।

खजाने का रखवाला

बगदाद के खलीफा हजरत अली अपने कुछ खास उसूलों के लिए जाने जाते थे। उनके दिल में प्रजा के लिए बेहद प्यार था। वह कभी अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करते थे। वह भी अन्य कर्मचारियों की तरह राजकाज और प्रजा की सेवा के बदले हर रोज शाम में सिर्फ तीन दिरहम लिया करते थे। दिरहम वहां की मुद्रा थी। उनका यह वेतन दूसरे कर्मचारियांे के वेतन से बहुत कम था। अक्सर उनके सलाहकार और दोस्त उनसे कहा करते थे , ' आप तो राज्य के मालिक हैं और यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। आपको राज्य की सुविधाओं का खुलकर उपभोग करना चाहिए। खूब ऐशोआराम से जीना चाहिए।

आप इस तरह अभाव और सादगी से क्यों जीते हैं ?' इस पर हजरत अली का जवाब होता था , ' राज्य का खजाना और सुविधाएं मेरे और मेरे परिवार के उपभोग के लिए नहीं हैं , मैं बस इनका रखवाला हूं। प्रजा ने मुझे इनकी हिफाजत की जिम्मेदारी सौंपी है। फिर मैं इनका इस्तेमाल कैसे कर सकता हूं। ' खलीफा के इस जवाब से सब निरुत्तर हो जाते थे। खलीफा की बेगम भी अपने शौहर की सिद्धांतप्रियता से भलीभांति परिचित थी। फिर भी एक बार उसने उनसे प्रार्थना की , ' अगर आप मुझे तीन दिनों की तनख्वाह पेशगी ला दें , तो मैं ईद पर बच्चों के लिए नए कपड़े बनवा लूं। ' खलीफा बोले , ' अगर मैं तीन दिन जिंदा न रहा तो यह कर्ज कौन चुकाएगा। तुम खुदा से मेरी जिंदगी के तीन दिनों का पट्टा ला दो , तो मैं खजाने से तीन दिन की तनख्वाह पेशगी उठा लूंगा। ' बेगम को अपनी भूल का अहसास हुआ।

मीठी बोली

मधुप नामक एक व्यक्ति शहद बेचा करता था। उससे कोई शहद खरीदे या नहीं पर वह सभी से बड़े प्रेम से और मधुर वाणी में बात करता था। उसके स्वर में इतनी मिठास थी कि कई बार लोग उसकी बोली से ही प्रभावित होकर शहद खरीद लेते थे। इस प्रकार उसकी दिन-दूनी, रात चौगुनी तरक्की होती जा रही थी। कुछ ही समय में वह इतना संपन्न हो गया कि उसने अपनी एक दुकान खोल ली। दुकान खोलने पर भी उसका व्यवहार पहले की तरह मधुर बना रहा।

उसके साथ वाली दुकान पर एक व्यक्ति फल बेचा करता था। मधुप के आने के बाद उसे ऐसा महसूस होने लगा कि उसके व्यापार में घाटा हो रहा है। वह मधुप से ईर्ष्या करने लगा। उसने मधुप को सबक सिखाने का निश्चय किया। उसने भी फलों के बजाय शहद बेचना आरंभ कर दिया। फिर भी सभी ग्राहक मधुप की दुकान पर ही जाते और उसकी दुकान पर केवल मक्खियां भिनभिनाती रहतीं। यह देखकर वह चिड़चिड़ा रहने लगा।

उसकी इस स्थिति से उसकी पत्नी बहुत दुखी रहती थी। एक दिन उसने अपने पति को समझाया, 'तुमने मधुप की देखादेखी शहद तो रखना शुरू कर दिया मगर उसके जैसी मिठास अपनी बोली में क्यों नहीं डाली? यदि वाणी मधुर न हो तो अच्छे से अच्छा व्यवसाय भी ठप हो जाता है। व्यवसाय क्या, जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति असफल हो जाता है। तुम अपना पुराना फलों का व्यापार ही करो।

बस अपने अंदर परिवर्तन लाओ। अपनी कर्कश वाणी को तिलांजलि देकर मधुर वाणी से नाता जोड़ो, तुम्हारा व्यापार भी आगे बढ़ेगा और तुम्हारी किसी से दुश्मनी भी नहीं होगी।' पत्नी की बात दुकानदार की समझ में आ गई। अगले ही दिन से उसने अपना पुराना कारोबार शुरू कर दिया और अपनी बोली में मिठास डाली। उसके फलों की बिक्री तेजी से होने लगी। इस बीच उसकी मधुप से भी दोस्ती हो गई। उसका व्यवसाय भी मधुप के कारोबार की तरह आगे बढ़ने लगा।

मनुष्य और ईश्वर

एक महात्मा गंगा तट पर प्रवचन कर रहे थे। भारी भीड़ जमा थी। चर्चा का विषय था-जीव और ब्रह्म की एकता। दोनों के संबंध का विश्लेषण करते हुए महात्मा ने कहा कि जीव ईश्वर का ही अंश है। जो गुण ईश्वर में हैं, वे जीव में भी मौजूद हैं।

सुनने वालों में से एक ने पूछा, 'भगवन्! ईश्वर तो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है, पर जीव तो अल्पज्ञ और अल्प सामर्थ्य वाला, फिर इस भिन्नता के रहते एकता कैसी?' यह सुनकर महात्मा जी मुस्कराए। फिर उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, 'एक लोटा गंगाजल ले आओ।' वह व्यक्ति लोटे में गंगाजल जल भर लाया। फिर महात्मा जी ने उस व्यक्ति से पूछा, 'अच्छा यह बताओ कि गंगा के जल और इस लोटे के जल में कोई अंतर तो नहीं है?'

वह व्यक्ति बोला, 'बिल्कुल नहीं।' महात्मा जी ने कहा, 'देखो, सामने गंगाजल में नावें चल रही हैं। एक नाव इस लोटे के जल में चलाओ।' यह सुनकर वह व्यक्ति भौंचक रह गया और महात्मा जी का मुंह ताकने लगा। फिर उसने साहस करके कहा, 'भगवन् लोटा तो छोटा है और इसमें थोड़ा ही जल है। इतने में भला नाव कैसे चलेगी।'

महात्मा जी ने गंभीर होकर कहा, 'जीव एक छोटे दायरे में सीमाबद्ध होने के कारण लोटे के जल के समान अल्पज्ञ और अशक्त बना हुआ है। यदि यह जल फिर गंगा में लौटा दिया जाए तो उस पर नाव चलने लगेगी, इसी प्रकार यदि जीव अपनी संकीर्णता के बंधन काटकर महान बन जाए तो उसे ईश्वर जैसी सर्वज्ञता और शक्ति सहज ही प्राप्त हो सकती है।'

मन की ताकत

गणेश शंकर विद्यार्थी अपने समय के जाने-माने पत्रकार थे। वह राष्ट्रीय एकता और आम आदमी के हक के लिए हमेशा संघर्षरत रहे। जिन दिनों वह कानपुर में थे, उन दिनों वहां कुछ शरारती तत्व शहर का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने पर लगे थे। शहर की हालत से गणेश शंकर विद्यार्थी बेहद परेशान थे और किसी तरह शांति स्थापित करना चाहते थे। उन्होंने दंगा-फसाद करने वालों को सबक सिखाने की ठान ली।

विद्यार्थी जी शरीर से दुबले-पतले थे, मगर आत्मविश्वास और साहस उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ था। एक दिन वह लोगों को शांत कराते हुए जनरल गंज की ओर निकल गए। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि पहलवान जैसा दिखने वाला एक आदमी जूते की दुकान को लूट रहा है। वह जूतों को एक बोरे में भर रहा था और दुकानदार उसके सामने हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहा था। यह देखकर विद्यार्थी जी जोर से बोले, 'ठहरो।' वहां कई लोग खड़े थे। वे यह देखकर हैरान रह गए कि एक दुबला-पतला व्यक्ति भीमकाय शरीर वाले बदमाश को ललकार रहा है।

बदमाश विद्यार्थी जी की ओर लपका तो वह उसे दुत्कारते हुए बोले, 'तुम्हें शर्म नहीं आती? दुकान का माल क्या मुफ्त का है? इतने तगड़े होकर भी सेवा या मदद तो कर नहीं रहे, उलटे दूसरों को लूट रहे हो।' बदमाश यह सुनकर शर्म से गड़ गया और सारा सामान छोड़कर वहां से चंपत हो गया। उसके जाने के बाद लोग विद्यार्थी जी से बोले, 'वह व्यक्ति आपसे तगड़ा था, आपको उससे डर नहीं लगा?'

विद्यार्थी जी बोले, 'वह तगड़ा कहां था! सिर्फ शरीर से तगड़े को मैं तगड़ा नहीं मानता। मन से वह दुर्बल था, तभी तो गलत काम कर रहा था। गलत काम करने वाला शरीर से भले ही मजबूत हो, मन से बहुत कमजोर होता है। यदि हम मनुष्य होकर भी मनुष्यता से दूर भागते हैं तो मनुष्यता का अर्थ ही क्या रह जाता है?' विद्यार्थी जी की इस बात पर वहां उपस्थित सभी लोग शर्मिंदा हो गए।

सादगी का पाठ

ईरानी बादशाह अब्बास शिकार के लिए जंगल में भटक रहे थे। वहां उनकी भेंट एक चरवाहे बालक से हुई, जिसका नाम था मुहम्मद अली बेग। बादशाह उसकी हाजिरजवाबी से बेहद प्रभावित हुए और उसे अपने साथ ले आए। उन्होंने उसे अपना खजांची बना दिया।

अली बेग पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ काम करने लगा। शाह अब्बास की मृत्यु के बाद उनका अल्पवयस्क पोता शाह सफी राजगद्दी पर बैठा। किसी ने शाह के कान भर दिए कि अली बेग राज्य के धन का गलत इस्तेमाल कर रहा है। शाह ने उस प्रकरण की जांच स्वयं अपने पास रखी और एक दिन बिना सूचना के उसकी हवेली का निरीक्षण करने जा पहुंचा।

शाह ने हवेली के सब कमरों का निरीक्षण किया। थोड़ी सी वस्तुओं के अतिरिक्त वहां कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था। शाह निराश लौटने लगा तो खोजियों के संकेत पर शाह की नजर एक बंद कमरे की ओर गई। उसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे। अब शाह की शंका को कुछ आधार मिला।

उन्होंने पूछा, 'इसमें क्या चीज है, जिसके लिए इतने मजबूत ताले लगाए हैं?' ताले खोले गए। शाह ने कमरे के बीच मेज पर एक लाठी, सुराही, कुछ बर्तन, कुछ पोशाक और दो मोटे कंबल देखे। अली बेग ने कहा, 'जब स्वर्गीय शाह मुझे यहां लाए थे, उस समय मेरे पास यही वस्तुएं थीं और आज भी मेरे पास अपना कहने को यही हैं। मैं इन चीजों से ही प्रेरणा ग्रहण करता हूं और उसी स्तर का जीवन बनाए रखता हूं।' युवा बादशाह यह देखकर लज्जित हो गया।